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पड़ोस में बनता नया गठजोड़

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर तालिबान के काबिज हो जाने के बाद अब क्षेत्रीय स्तर पर उभरता नया शक्ति संतुलन न सिर्फ भारत बल्कि अमेरिका समेत तमाम पश्चिमी देशों के लिए चिंता का नया कारण बन सकता है। हालांकि फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान काबुल एयरपोर्ट से आ रही हृदयविदारक तस्वीरों पर लगा है। तालिबान के खौफ के मारे किसी भी उपाय से जान बचाकर अफगानिस्तान से निकलने की बेकरारी में विमान के पहियों से लटके लोगों की मौत के दृश्य कभी नहीं भुलाए जा सकेंगे।

अगर तालिबान को शासन करना है तो उसे आतंक और दहशत का यह माहौल बदलना होगा। अभी उसकी कोशिश दुनिया को यह एहसास दिलाने की भी है कि वह बदल गया है। यानी 1996-2001 के बीच उसने अफगानिस्तान में जो जुल्म-ज्यादतियां की थीं, इस बार नहीं होंगी। इसके जरिये वह वैश्विक समुदाय में स्वीकार्यता बढ़ाना चाहता है। इसीलिए तालिबान ने देश के अंदर आम माफी का ऐलान किया है। उसने लोगों से रूटीन लाइफ की ओर लौटने की अपील की है।

इसका कितना असर अफगानिस्तान के आम लोगों पर होता है और खुद तालिबान अपने वादों पर कितना अमल करता है, यह कुछ समय बाद स्पष्ट होगा। लेकिन इस बीच इतना तय हो चुका है कि चाहे जिस तरह की भी सरकार बने, तालिबान ही मुख्य भूमिका में होगा। इसीलिए आस-पड़ोस के कई देशों ने तालिबान के नेतृत्व वाले अफगानिस्तान के साथ सहयोग की इच्छा दर्शानी शुरू कर दी है। इनमें सबसे आगे है चीन। उसने साफ-साफ कहा है कि वह अपना भविष्य खुद गढ़ने के अफगानी लोगों के अधिकार का सम्मान करता है और उनके साथ दोस्ती और सहयोग के संबंधों का विकास जारी रखना चाहता है।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने तो काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद यहां तक कह दिया कि अफगानिस्तान के लोगों ने गुलामी की जंजीरें तोड़ डाली हैं। तालिबान से पाकिस्तान के करीबी संबंधों पर तो खैर पहले भी कोई शक नहीं था। लेकिन इस बीच रूस ने भी तालिबान के प्रतिनिधियों से बातचीत शुरू करने की बात सार्वजनिक रूप से मानी, जो संकेत है कि दोनों पक्षों में सहयोग की जमीन तैयार हो रही है।

ध्यान रहे, पिछली बार तालिबान के शासन को न तो रूस ने मान्यता दी थी और न चीन ने। तब उसे महज तीन देशों- पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई- से मान्यता मिली थी। जाहिर है, इस बार तालिबान की प्राथमिकताएं भी बदली हुई हैं। उसके प्रयासों का ही फल है कि ईरान ने अभी खुलकर कुछ भले न कहा हो, इतना संकेत उसने भी दिया है कि अगर उसके हितों पर कोई चोट न पहुंचे और सीमावर्ती शिया आबादी को न छेड़ा जाए तो सहयोग के संबंधों पर विचार करने में उसे खास दिक्कत नहीं होगी। साफ है कि चीन, पाकिस्तान, रूस, ईरान और अफगानिस्तान का यह संभावित गठजोड़ अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत जैसे देशों के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती साबित हो सकता है जो चीन को अपने साझा विरोधी के रूप में देखते हैं।


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